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मेक इन इंडिया में धारावी निभाएगी अहम भूमिका

इंद्रजीत सिंह, मुंबई: एशिया की सबसे बड़ी झोपड़पट्टी धारावी अब कोरोना के कहर से उबर चुकी है। यहां जिंदगी पटरी पर दुबारा लौटने लगी है। हालांकि ज्यादातर मजदूर कोरोना के डर से गांव चले गए हैं, लेकिन बचे हुए कामगारों को लेकर कारोबार फिर शुरू होने लगा है। काम करने का तरीका और कारोबार में थोड़ा बदलाव आया, कल तक रेन कोर्ट बनाने वाले आज पीपीई किट बनाने लगे हैं तो छोटे-छोटे बैग बनाने वाले मास्क और सैनिटाइजर।

एशिया की सबसे बड़ी झोपड़पट्टी धारावी में जब कोरोना ने कहर बरपाया तो पूरे देश की नजर धारावी पर थी। इस छोटे से इलाके में 10 से 12 लाख की जनसंख्या होने और छोटे-छोटे घरों में 8-10 लोगों का परिवार के कारण किसी को भी नहीं उम्मीद थी कि धारावी में हालत जल्द सुधरेंगे। लेकिन बीएमसी प्रशासन, डॉक्टरों और पुलिस की मेहनत रंग लाई। आज धारावी कोरोना मुक्त होने के काफ़ी करीब है, अब यहां न सिर्फ जिंदगी पटरी पर लौटने लगी है बल्कि छोटे-छोटे कारखाने भी यहां मौजूद मजदूरों को लेकर शुरू हो गए हैं।

धारावी में एक समय ऐसा था कि 100 से 150 कोरोना मरीज़ रोजाना आ रहे थे। बड़े पैमाने पर मरीजों की मौत भी हो रही थी। लोग पलायन करने लगे और छोटे उद्योगों पर ताला लग गया था। धारावी के नाम से लोग डरने लगे थे। डॉक्टरों ने डोर टू डोर स्क्रीनिंग शुरू की तो पुलिस और एसआरपीएफ ने सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करवाने के लिए दिन-रात एक कर दिया। धारावी में तैनात पुलिसवाले बड़ी संख्या में कोरोना पॉजिटिव होने लगे, लेकिन पुलिस ने लोगों के साथ मिलकर लड़ाई जारी रखी और आज कारखाने शुरू हो गए। लोग सीमित संसाधनों के साथ कोरोना की जंग में भी अब अपना योगदान देने लगे हैं। रेन कोट बनाने वाले पीपीई किट बनाने लगे हैं।

धारावी माइक्रो और स्मॉल स्केल इंडस्ट्री के लिए जाना जाता है। यहां गली-गली में लेदर, गारमेंट, प्लास्टिक, तेल, पापड़ और फरसाण जैसे अनेको उद्योग हैं। जहां ज्यादातर उत्तरप्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल के मजदूर काम करते हैं। लेकिन कोरोना के डर के कारण ज्यादातर मजदूर गांव चले गए, लेकिन सीमित मजदूरों के साथ धारावी की रौनक लौटने लगी है। अब धारावी ने कोरोना पर लगभग फतह हासिल कर ली है।

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